ईश्वर बिना ही कारण सब पर दया करता है. प्रत्युपकार के बिना न्याय करता है और सब को समान समझ कर सब से प्रेम करता है. इसलिए उस को मानना कर्तव्य है और कर्तव्य का पालन करना ही मनुष्य का मनुष्यत्व है.
ईश्वर के मानने से उसकी प्राप्ति के लिए उसके गुण, प्रेम, प्रभाव को जानने को खोज होती है और उसके नाम का जप, स्वरुप का ध्यान, गुणों के श्रवण-मनन की चेष्टा होती है, जिससे मनुष्य के पापों, अवगुणों एवं दुखों का नाश होकर उसे परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है.
अच्छी प्रकार से समझ कर ईश्वर को मानने से मनुष्य के द्वारा किसी प्रकार का दुराचार नहीं हो सकता. जिन मनुष्यों में दुराचार देखने में आते हैं, वे वास्तव में ईश्वर को मानते ही नहीं हैं. झूठे ही ईश्वरवादी बने हुए हैं.
सच्चे ह्रदय से ईश्वर को माननेवालों की सदा से जय होती आई है. ध्रुव-प्रह्लदादि जैसे अनेकों ज्वलंत उदहारण शाश्त्रों में भरे हैं. वर्तमान में भी सच्चे ह्रदय से ईश्वर को मान कर उसकी शरण लेने वालों की प्रत्यक्ष उन्नति देखी जाती है.
सम्पूर्ण श्रुति, स्मृति आदि शास्त्रों की सार्थकता भी ईश्वर के मानने से ही सिद्ध होती है, क्योंकि सम्पूर्ण शाश्त्रों का ध्येय ईश्वर के प्रतिपादन में ही है.
2 comments:
सुंदर विचार
धन्यवाद
pr checker net seo backlinks backlink service
Post a Comment