
हर व्यक्ति चाहता है कि उस का जीवन सुखी हो, उसका परिवार, नाते-रिश्तेदार, मित्र, पड़ोसी सब सुख से रहें. इस के लिए वह हर प्रयत्न करता है. परन्तु उस के यह सारे प्रयत्न बेकार हो जाते हैं जब किसी आतंकवादी की गोली या बम इन में किसी की जान ले लेता है. निर्दोष नागरिकों पर जान लेवा हमला करने वाला यह आतंकवादी क्या इंसान है? कोई इंसान ऐसा नहीं कर सकता. यह आतंकवादी इंसान के रूप में हैवान है. इन हैवानों को इस जमीन से मिटा देना हर इंसान का , हर समाज का, हर देश का, हर देश की सरकार का कर्तव्य है. लेकिन जब भी कभी पुलिस या सुरक्षा एजेंसियां किसी आतंकी हैवान को मारती हैं, छद्म मानव अधिकारवादी चिल्लाने लगते हैं, इन हैवानों के मानवाधिकारों की दुहाई देने लगते हैं. यह छद्म मानव अधिकारवादी भी एक तरह से हैवान ही हैं, जिन्हें निर्दोष इंसानों की चीख-पुकार सुनाई नहीं पड़ती, पर इन हैवानों के लिए उनके दिल में दर्द पैदा होता है.
यह आतंकी हैवान जब इंसान ही नहीं हैं तब इनके मानवाधिकारों की बात कैसे की जा सकती है? मानव अधिकार मानवों के होते हैं, हैवानों के नहीं. सुप्रीम कोर्ट के जज, श्री अर्जीत पसायत, ने बड़े स्पष्ट शब्दों में यह बात कही है कि ऐके ४७ से निर्दोष लोगों की हत्या करने वाला आतंकी इंसान नहीं कहा जा सकता, और जब वह इंसान ही नहीं है तो उसके इंसानी अधिकारों की बात कैसे की जा सकती है? नीचे मैंने अखबार में इस विषय पर छपे समाचार की स्केंड फोटो दी है. आप उस पर क्लिक करके पूरी ख़बर पढ़ सकते हैं.