अपने सोच को सकारात्मक बनाइये,
यह विपरीत परिस्थिति मैं आपकी मदद करेगा,
नकारात्मक सोच से बचिए, यह
सही परिस्थिति को भी आपके ख़िलाफ़ कर देता है.
हर इंसान चाहता है उस का जीवन सुखी हो. इस के लिए वह सारे प्रयत्न करता है. कुछ सफल होते हैं. कुछ नहीं. फ़िर लोगों की अपनी अलग परिभाषाएं हैं सुखी जीवन की. कुछ लोग थोड़ा पाकर भी खुश हो जाते हैं. कुछ लोग बहुत कुछ पाकर भी खुश नहीं होते. आईये इस ब्लाग में इस पर चर्चा करें.
दुःख का अनुभव किए बिना सुख का महत्व पता नहीं चलता. इस लिए दुःख से घबराना नहीं चाहिए. दुःख से सीखना चाहिए. समस्याओं के प्रति सकारात्मक द्रष्टिकोण रखने से अनेक समस्याएं आसानी से हल हो जाती हैं. मनुष्य को प्रकृति से सीखना चाहिए, उस से मुकाबला नहीं करना चाहिए. प्रकृति के नियमों का अनुसरण करके सुखी जीवन जिया जा सकता है.
Saturday, November 01, 2008
मन चंगा तो कठौती में गंगा
सुखी जीवन का सबसे बड़ा मन्त्र है, आत्म संतोष, पर मनुष्य जीवन भर भाग-दौड़ करता है, न जाने क्या-क्या प्रपंच रचता है, पर असंतुष्ट ही रहता है. जितनी जल्दी मन में संतोष आ जाय उतनी जल्दी जीवन सुखी हो जाय.
Labels:
better life,
happy life,
inner satisfaction
Thursday, October 30, 2008
पर्यावरण और जीवन
जल और जीवन एक हैं,
जल संचय तो जीवन संचय,
जल का क्षय है जीवन का क्षय.
पर्यावरण का सम्मान करें,
ऐसा कोई कार्य न करें
जो करे प्रदूषित
जल, वायु और मिटटी को
और शोर बढ़ाऐ.
जल संचय तो जीवन संचय,
जल का क्षय है जीवन का क्षय.
पर्यावरण का सम्मान करें,
ऐसा कोई कार्य न करें
जो करे प्रदूषित
जल, वायु और मिटटी को
और शोर बढ़ाऐ.
Labels:
better life,
clean air,
clean water,
environment,
less noise,
pollution
Thursday, September 25, 2008
क्या कोई चाहता है दुखी होना?
नहीं, कोई यह नहीं चाहता कि वह दुखी हो. सब चाहते हैं कि उनका जीवन सुखी हो. पर कुछ लोग अपना जीवन सुखी करने के लिए दूसरों का जीवन दुखी कर देते हैं. आज सुबह पार्क में एक सज्जन बता रहे थे कि उनके अपने बेटे ने उनका जीवन दुखी कर रखा है. वह विधुर हैं. उनकी पत्नी का स्वर्गवास कुछ वर्ष पहले हो गया. दो बेटे हैं. बड़े बेटे ने अपना मकान अलग बना लिया है. छोटा बेटा उनके मकान में रहता है. सारे मकान पर उस ने अपना कब्जा कर रखा है. यह सज्जन ग्राउंड फ्लोर पर एक कमरे में रहते हैं. अब उनका बेटा चाहता है कि वह यह कमरा भी खाली कर दें, जिस से वह वहां एक दूकान खोल सके. वह कहाँ जायेंगे इस से उसे कोई मतलब नहीं है. उस की पत्नी और बच्चे भी इन सज्जन से बुरा व्यवहार करते हैं. अब यदि एक बेटा अपने पिता से ऐसा व्यवहार कर सकता है तो दूसरों का क्या कहा जा सकता है.
मेरे एक और जानकार हैं. वह मेरी एक क्लाइंट कम्पनी में काम करते हैं. सत्तर वर्ष से ऊपर उनकी आयु है. यह नौकरी उनको मजबूरी में करनी पड़ी है. दो बेटियाँ हैं उनकी. कोई बेटा नहीं है. दोनों बेटियों की शादी कर दी. पर बड़ी बेटी विधवा हो गई. ससुराल वालों ने उस पर इतना अत्त्याचार किया कि वह दिमागी तौर पर पागल हो गई. उसे और उसकी दो बेटियों को घर से बाहर निकाल दिया. बेचारी अपने पिता के घर आ गई. कभी मेरे पास बैठते हैं तो रोने लगते हैं. कहते हैं कि बेटियों की शादी के बाद वह बहुत सुखी थे. कभी सोचा भी नहीं था कि इस उमर में आकर उन्हें फ़िर भाग-दौड़ करनी पड़ेगी. एक दुःख कि बात यह भी है कि कम्पनी के मालिक उनकी इस मजबूरी का पूरा फायदा उठाते हैं. वह सबसे ज्यादा काम करते हैं पर उन्हें सबसे कम तनख्वाह मिलती है. मेरे आडिट में उनके विभाग में कभी कोई कमी नहीं मिलती. बहुत पैसे हैं कम्पनी के मालिकों के पास, पर इन को इन के काम की पूरी तनख्वाह नहीं देते. मैंने कई बार अपरोक्ष रूप से यह बात उठाई पर कोई न कोई बहाना करके टाल जाते हैं.
हमारे अपार्टमेंट्स में ऐसे कई परिवार हैं जिन्हें दूसरों को दुखी करने में ही आनंद मिलता है. यह सब पढ़े-लिखे हैं और स्वयं को दूसरों से महान साबित करने में लगे रहते हैं. पर कोई मौका नहीं चूकते दूसरों को दुखी करने का. लोग शिकायत करते हैं तो दूसरों पर दोष लगाने लगते हैं.
ऐसा भी नहीं है कि किसी के दुखी जीवन के लिए दूसरे ही जिम्मेदार हों. कुछ लोग ख़ुद ही अपने जीवन को दुखी कर लेते हैं. एक सज्जन हैं. दिन भर इधर-उधर इसकी-उसकी करेंगे. शाम को बहू की शिकायत पत्रिका खोल कर बैठ जायेंगे. थका हारा बेटा दफ्तर से आएगा और यह उसे जरा साँस भी नहीं लेने देंगे और शुरू हो जायेंगे. एक और सज्जन हैं जो सब से अपने बेटे की बुराई करते फिरते हैं. यह भी नहीं सोचते कि सब पड़ोसी उन के बेटे को अच्छी तरह जानते हैं और उसकी बहुत इज्जत करते हैं. ऐसी ही कुछ महिलायें भी हैं. अब अगर यह सब अपने दुखी जीवन का रोना रोते रहें तो क्या किया जाय, ख़ुद ही तो जिम्मेदार हैं उसके लिए.
पता नहीं क्यों कुछ लोग न ख़ुद खुश रहते हैं और न दूसरों को सुखी रहने देते हैं. अरे भाई ख़ुद भी सुखी जीवन बिताओ और दूसरों को भी सुखी जीवन बिताने दो.
प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से.
मेरे एक और जानकार हैं. वह मेरी एक क्लाइंट कम्पनी में काम करते हैं. सत्तर वर्ष से ऊपर उनकी आयु है. यह नौकरी उनको मजबूरी में करनी पड़ी है. दो बेटियाँ हैं उनकी. कोई बेटा नहीं है. दोनों बेटियों की शादी कर दी. पर बड़ी बेटी विधवा हो गई. ससुराल वालों ने उस पर इतना अत्त्याचार किया कि वह दिमागी तौर पर पागल हो गई. उसे और उसकी दो बेटियों को घर से बाहर निकाल दिया. बेचारी अपने पिता के घर आ गई. कभी मेरे पास बैठते हैं तो रोने लगते हैं. कहते हैं कि बेटियों की शादी के बाद वह बहुत सुखी थे. कभी सोचा भी नहीं था कि इस उमर में आकर उन्हें फ़िर भाग-दौड़ करनी पड़ेगी. एक दुःख कि बात यह भी है कि कम्पनी के मालिक उनकी इस मजबूरी का पूरा फायदा उठाते हैं. वह सबसे ज्यादा काम करते हैं पर उन्हें सबसे कम तनख्वाह मिलती है. मेरे आडिट में उनके विभाग में कभी कोई कमी नहीं मिलती. बहुत पैसे हैं कम्पनी के मालिकों के पास, पर इन को इन के काम की पूरी तनख्वाह नहीं देते. मैंने कई बार अपरोक्ष रूप से यह बात उठाई पर कोई न कोई बहाना करके टाल जाते हैं.
हमारे अपार्टमेंट्स में ऐसे कई परिवार हैं जिन्हें दूसरों को दुखी करने में ही आनंद मिलता है. यह सब पढ़े-लिखे हैं और स्वयं को दूसरों से महान साबित करने में लगे रहते हैं. पर कोई मौका नहीं चूकते दूसरों को दुखी करने का. लोग शिकायत करते हैं तो दूसरों पर दोष लगाने लगते हैं.
ऐसा भी नहीं है कि किसी के दुखी जीवन के लिए दूसरे ही जिम्मेदार हों. कुछ लोग ख़ुद ही अपने जीवन को दुखी कर लेते हैं. एक सज्जन हैं. दिन भर इधर-उधर इसकी-उसकी करेंगे. शाम को बहू की शिकायत पत्रिका खोल कर बैठ जायेंगे. थका हारा बेटा दफ्तर से आएगा और यह उसे जरा साँस भी नहीं लेने देंगे और शुरू हो जायेंगे. एक और सज्जन हैं जो सब से अपने बेटे की बुराई करते फिरते हैं. यह भी नहीं सोचते कि सब पड़ोसी उन के बेटे को अच्छी तरह जानते हैं और उसकी बहुत इज्जत करते हैं. ऐसी ही कुछ महिलायें भी हैं. अब अगर यह सब अपने दुखी जीवन का रोना रोते रहें तो क्या किया जाय, ख़ुद ही तो जिम्मेदार हैं उसके लिए.
पता नहीं क्यों कुछ लोग न ख़ुद खुश रहते हैं और न दूसरों को सुखी रहने देते हैं. अरे भाई ख़ुद भी सुखी जीवन बिताओ और दूसरों को भी सुखी जीवन बिताने दो.
प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से.
Tuesday, August 26, 2008
चाय, समोसा और उस की हँसी
गोरा रंग, बड़ी बड़ी आँखें, खिलखिलाती हुई हँसी, बस इतना ही जान पाया उस के बारे मैं. यह तब की बात है जब मैं डिफेन्स रिसर्च में काम करता था. हैदराबाद से ट्रांसफर होकर दिल्ली आया था. साऊथ ब्लाक के पास था मेरा आफिस. मैं अपने नए बने साथियों के साथ चाय पीने जहाँ आता था, वह भी अपनी सहेलिओं के साथ वहां चाय पीने आती थी. एक दिन पास की मेज से खिलखिलाने की आवाज आई तब मैंने उसे पहली बार देखा. इतनी मुक्त हँसी मैंने जीवन में पहली बार देखी थी और सुनी थी. उस दिन समोसे और चाय, दोनों ही बहुत स्वादिष्ट लगे. फ़िर तो एक क्रम सा बन गया. समोसे और चाय और उसकी हँसी. समोसे और चाय के पैसे लगते थे पर हँसी फ्री में मिलती थी. समोसे और चाय में मिलाबट होती थी पर उसकी हँसी सुबह की ओस जैसी साफ़ और पवित्र.
फ़िर एक दिन उसकी हँसी के बिना चाय पीनी पड़ी. वह थी वहां पर, पर कुछ चुप-चुप और गुम-सुम. मैंने कहा हो न हो उसकी शादी की बात चल रही है. वह हफ्ता ऐसे ही बिना हँसी के गुजर गया. नए हफ्ते में फ़िर वही खिलखिलाहट. कुछ और भी था उस हँसी में, जो उसके चेहरे की चमक से धूप-छाओं खेल रहा था. मैंने कहा हो न हो उसकी शादी की बात पक्की हो गई है. मेरे दोस्तों ने कहा मुझे उस से प्यार हो गया है. मैंने कहा नहीं यह बात नहीं है. कभी उस के बारे में कुछ और जानने की, कभी उस से बात करने की इच्छा नहीं हुई. मेरा मन बस यह चाहता था कि वह हंसती रहे और में उसे देखता रहूँ. फ़िर उस ने आना बंद कर दिया.
एक दिन अचानक फ़िर हँसी सुनाई दी. वह ही तो थी. शादी की साड़ी में लिपटी, मांग में सिन्दूर, चेहरे पर प्यार की चमक, और इन सब के साथ उस की वही खिलखिलाती हँसी. आज समोसे और चाय हर दिन से ज्यादा स्वादिष्ट थे. फ़िर धीरे-धीरे उस की हँसी और मीठी होती गई. एक दिन उस के चेहरे की चमक आँखें चौंधिया रही थी. मैंने कहा वह मां बनने वाली है. फ़िर धीरे-धीरे उसका शरीर उस के मां बनने की चुगली करने लगा. फ़िर एक लम्बी छुट्टी. हम सब उसे भूल से गए. चाय और समोसे में वह स्वाद नहीं रहा.
एक दिन वह हँसी फ़िर आ गई. मैंने कहा जरूर बेटी हुई है. दोस्तों ने कहा यार यह कैसे कह सकते हो? मैंने कहा कुछ है उसके चेहरे मैं और उसकी हँसी में, कभी चेहरे पर बेटी की ममता की चमक और कभी एक काली लकीर की परछाईं. मैंने कहा उस के ससुराल वाले बेटी होने से खुश नहीं हैं. धीरे-धीरे वह मुक्त हँसी मुक्त नहीं रही. मैं और मेरे दोस्त एक अजीब सा दर्द महसूस करने लगे थे. अब उस जगह चाय पीने जाने का मन नहीं करता था. फ़िर मैंने डिफेंस रिसर्च छोड़ दिया और भारतीय मानक संस्था ज्वाइन कर ली. मेरी पहली पोस्टिंग कोलकाता में हुई.
इसके बाद उस हँसी से साथ छूट गया. और छूट गया चाय के साथ समोसा. कोलकाता में खूब मिठाई खाई. आज इतने सालों बाद उस हँसी की याद आई. मन गीला हो गया. सोचा आप सबसे बांटूं वह हँसी.
फ़िर एक दिन उसकी हँसी के बिना चाय पीनी पड़ी. वह थी वहां पर, पर कुछ चुप-चुप और गुम-सुम. मैंने कहा हो न हो उसकी शादी की बात चल रही है. वह हफ्ता ऐसे ही बिना हँसी के गुजर गया. नए हफ्ते में फ़िर वही खिलखिलाहट. कुछ और भी था उस हँसी में, जो उसके चेहरे की चमक से धूप-छाओं खेल रहा था. मैंने कहा हो न हो उसकी शादी की बात पक्की हो गई है. मेरे दोस्तों ने कहा मुझे उस से प्यार हो गया है. मैंने कहा नहीं यह बात नहीं है. कभी उस के बारे में कुछ और जानने की, कभी उस से बात करने की इच्छा नहीं हुई. मेरा मन बस यह चाहता था कि वह हंसती रहे और में उसे देखता रहूँ. फ़िर उस ने आना बंद कर दिया.
एक दिन अचानक फ़िर हँसी सुनाई दी. वह ही तो थी. शादी की साड़ी में लिपटी, मांग में सिन्दूर, चेहरे पर प्यार की चमक, और इन सब के साथ उस की वही खिलखिलाती हँसी. आज समोसे और चाय हर दिन से ज्यादा स्वादिष्ट थे. फ़िर धीरे-धीरे उस की हँसी और मीठी होती गई. एक दिन उस के चेहरे की चमक आँखें चौंधिया रही थी. मैंने कहा वह मां बनने वाली है. फ़िर धीरे-धीरे उसका शरीर उस के मां बनने की चुगली करने लगा. फ़िर एक लम्बी छुट्टी. हम सब उसे भूल से गए. चाय और समोसे में वह स्वाद नहीं रहा.
एक दिन वह हँसी फ़िर आ गई. मैंने कहा जरूर बेटी हुई है. दोस्तों ने कहा यार यह कैसे कह सकते हो? मैंने कहा कुछ है उसके चेहरे मैं और उसकी हँसी में, कभी चेहरे पर बेटी की ममता की चमक और कभी एक काली लकीर की परछाईं. मैंने कहा उस के ससुराल वाले बेटी होने से खुश नहीं हैं. धीरे-धीरे वह मुक्त हँसी मुक्त नहीं रही. मैं और मेरे दोस्त एक अजीब सा दर्द महसूस करने लगे थे. अब उस जगह चाय पीने जाने का मन नहीं करता था. फ़िर मैंने डिफेंस रिसर्च छोड़ दिया और भारतीय मानक संस्था ज्वाइन कर ली. मेरी पहली पोस्टिंग कोलकाता में हुई.
इसके बाद उस हँसी से साथ छूट गया. और छूट गया चाय के साथ समोसा. कोलकाता में खूब मिठाई खाई. आज इतने सालों बाद उस हँसी की याद आई. मन गीला हो गया. सोचा आप सबसे बांटूं वह हँसी.
Monday, August 18, 2008
भारत में जयचंदों की संख्या प्रिथ्विराजों से ज्यादा है
पति - अजी सुनती हो, चिरंजीवी गरीबी मिटाने राजनीति में आ रहा है।
पत्नी - अच्छा! मुझे पता ही नहीं था कि चिरंजीवी गरीब है।
पति - हाँ, यह अदंर की बात तो मुझे भी पता नहीं थी.
पत्नी - बैसे है अक्लमंद वह। गरीबी मिटाने के लिए राजनीति से ज्यादा आसान और अच्छा धंदा कोई नहीं है आजकल।
पति - शबाना ने कहा क्योंकि वह मुसलमान है इस लिए मुंबई में उसे कोई मकान नहीं देता।
पत्नी - पर आज तक क्या वह फुटपाथ पर रहती थी?
पति - अगर वह मुझसे कहती तो मैं जरूर अपना मकान उसे दे देता।
पत्नी - और ख़ुद फुटपाथ पर रहने चले जाते। लगता है इसी लिए उसे मकान नहीं मिलता।
पति - क्लिनिकल ट्रायल में ४९ बच्चे मर गए। एम्स के डाक्टर्स का कहना है ट्रायल्स को दोष न दें।
पत्नी - डाक्टर्स की बात सही है। अगर उन्होंने बच्चों के माता-पिता से आज्ञा लिए बिना ऐसा किया तब तो यह कत्ल हुआ और इस की सजा डाक्टर्स को मिलनी चाहिए।
पति - लालू ने कहा कि सिमी आतंकवादियों की गिरफ्तारी ग़लत है। इस से पहले उन्होंने सिमी पर पाबंदी का विरोध किया था।
पत्नी - अब समय आ गया है कि आतंकवादियों के समर्थक भी गिरफ्तार किए जाएँ वरना यह जयचंद इस देश को फ़िर से गुलाम बना देंगे।
पति - फेल्प्स ने ओलम्पिक में अकेले जितने पदक जीते हें वह भारत के १०८ वर्षों में जीते पदकों के बराबर हें। और तो और, फेल्प्स ने १४ स्वर्ण पदक जीते हें और भारत केवल ९ स्वर्ण पदक जीत पाया है।
पत्नी - जब तक खिलाड़ी खेल खेलते रहेंगे तब तक यही होगा। बाबू और नेताओं को खेलने दो फ़िर देखो सारे पदक भारत को मिलेंगे।
पति - चीन ने भारत के राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री को ओलम्पिक के लिए आमंत्रित नहीं किया। उसने सोनिया और उस के परिवार को न्योता भेजा। कितनी शर्म और बेइज्जती की बात् है।
पत्नी - शर्म और बेइज्जती की बात चीन के लिए नहीं सोनिया के लिए है, जिसने देश का अपमान करने wale इस निमंत्रण को स्वीकार किया। यही होगा जब किसी विदेशी को देश और सरकार से ऊपर रखा जाएगा।
पति - पर भारत के बहुत सारे लोग उसे अपने नेता के रूप में देखते हें।
पत्नी - यही तो अफ़सोस है कि भारत में जयचंदों की संख्या प्रिथ्विराजों से ज्यादा है।
पत्नी - अच्छा! मुझे पता ही नहीं था कि चिरंजीवी गरीब है।
पति - हाँ, यह अदंर की बात तो मुझे भी पता नहीं थी.
पत्नी - बैसे है अक्लमंद वह। गरीबी मिटाने के लिए राजनीति से ज्यादा आसान और अच्छा धंदा कोई नहीं है आजकल।
पति - शबाना ने कहा क्योंकि वह मुसलमान है इस लिए मुंबई में उसे कोई मकान नहीं देता।
पत्नी - पर आज तक क्या वह फुटपाथ पर रहती थी?
पति - अगर वह मुझसे कहती तो मैं जरूर अपना मकान उसे दे देता।
पत्नी - और ख़ुद फुटपाथ पर रहने चले जाते। लगता है इसी लिए उसे मकान नहीं मिलता।
पति - क्लिनिकल ट्रायल में ४९ बच्चे मर गए। एम्स के डाक्टर्स का कहना है ट्रायल्स को दोष न दें।
पत्नी - डाक्टर्स की बात सही है। अगर उन्होंने बच्चों के माता-पिता से आज्ञा लिए बिना ऐसा किया तब तो यह कत्ल हुआ और इस की सजा डाक्टर्स को मिलनी चाहिए।
पति - लालू ने कहा कि सिमी आतंकवादियों की गिरफ्तारी ग़लत है। इस से पहले उन्होंने सिमी पर पाबंदी का विरोध किया था।
पत्नी - अब समय आ गया है कि आतंकवादियों के समर्थक भी गिरफ्तार किए जाएँ वरना यह जयचंद इस देश को फ़िर से गुलाम बना देंगे।
पति - फेल्प्स ने ओलम्पिक में अकेले जितने पदक जीते हें वह भारत के १०८ वर्षों में जीते पदकों के बराबर हें। और तो और, फेल्प्स ने १४ स्वर्ण पदक जीते हें और भारत केवल ९ स्वर्ण पदक जीत पाया है।
पत्नी - जब तक खिलाड़ी खेल खेलते रहेंगे तब तक यही होगा। बाबू और नेताओं को खेलने दो फ़िर देखो सारे पदक भारत को मिलेंगे।
पति - चीन ने भारत के राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री को ओलम्पिक के लिए आमंत्रित नहीं किया। उसने सोनिया और उस के परिवार को न्योता भेजा। कितनी शर्म और बेइज्जती की बात् है।
पत्नी - शर्म और बेइज्जती की बात चीन के लिए नहीं सोनिया के लिए है, जिसने देश का अपमान करने wale इस निमंत्रण को स्वीकार किया। यही होगा जब किसी विदेशी को देश और सरकार से ऊपर रखा जाएगा।
पति - पर भारत के बहुत सारे लोग उसे अपने नेता के रूप में देखते हें।
पत्नी - यही तो अफ़सोस है कि भारत में जयचंदों की संख्या प्रिथ्विराजों से ज्यादा है।
Saturday, August 16, 2008
साबुन से नहाओ, पूती फलो
बहू ने सास को प्रणाम किया.
सास ने आशीर्वाद दिया, 'दूधों नहाओ, पूतों फलो।
बहू बिफर गई, 'यह कैसा आशीर्वाद है? क्या आप नहीं जानती कि मुझे दूध अच्छा नहीं लगता, और आप हें कि दूध में नहाने की बात कर रही हें? और कैसी स्त्री हें आप कि पूतों फलो कह रही हें? क्या आपको बेटियाँ अच्छी नहीं लगती?'
'अरे यह तो एक आशीर्वाद है', सास ने कहा, 'दूधों नहाओं का मतलब है सुखी रहो, और पूतों है तुकबंदी के लिए, क्या तुक बनती अगर में कहती 'साबुन से नहाओ, पूती फलो'। अरे बेटे और बेटी में कोई फर्क है क्या?'
बहू ने मन में कहा, 'बात तो आप ठीक कहती है' पर जोर से कहा, 'मैं सब समझती हूँ, यह सब नारी को बंधन में बाँधने का षड़यंत्र है। मैं इन घटिया परम्पराओं का विरोध करती हूँ। यह नारी प्रगति का ज़माना है। नारी अब जाग गई है।'
'बस बस', सास ने बीच में टोका, 'तेरे चिल्लाने से बिटिया जाग गई। उसे दूध पिला और चुप करा। बड़ी आई नारी प्रगति वाली। पहले नारी का मतलब तो समझ ले। इस लेप टाप ने तो इस का दिमाग ख़राब कर दिया है। अरे तू शादीशुदा है, अपना परिवार देख। जिनकी शादी नहीं हुई उनके चक्कर में पड़ कर अपना परिवार बिगाड़ेगी'।
सास ने आशीर्वाद दिया, 'दूधों नहाओ, पूतों फलो।
बहू बिफर गई, 'यह कैसा आशीर्वाद है? क्या आप नहीं जानती कि मुझे दूध अच्छा नहीं लगता, और आप हें कि दूध में नहाने की बात कर रही हें? और कैसी स्त्री हें आप कि पूतों फलो कह रही हें? क्या आपको बेटियाँ अच्छी नहीं लगती?'
'अरे यह तो एक आशीर्वाद है', सास ने कहा, 'दूधों नहाओं का मतलब है सुखी रहो, और पूतों है तुकबंदी के लिए, क्या तुक बनती अगर में कहती 'साबुन से नहाओ, पूती फलो'। अरे बेटे और बेटी में कोई फर्क है क्या?'
बहू ने मन में कहा, 'बात तो आप ठीक कहती है' पर जोर से कहा, 'मैं सब समझती हूँ, यह सब नारी को बंधन में बाँधने का षड़यंत्र है। मैं इन घटिया परम्पराओं का विरोध करती हूँ। यह नारी प्रगति का ज़माना है। नारी अब जाग गई है।'
'बस बस', सास ने बीच में टोका, 'तेरे चिल्लाने से बिटिया जाग गई। उसे दूध पिला और चुप करा। बड़ी आई नारी प्रगति वाली। पहले नारी का मतलब तो समझ ले। इस लेप टाप ने तो इस का दिमाग ख़राब कर दिया है। अरे तू शादीशुदा है, अपना परिवार देख। जिनकी शादी नहीं हुई उनके चक्कर में पड़ कर अपना परिवार बिगाड़ेगी'।
Thursday, August 07, 2008
नैना देवी मन्दिर और रेल दुर्घटना
नैना देवी मन्दिर और रेल दुर्घटना दोनों टाली जा सकती थीं. यात्रियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कंपनियां आज कल अन्तर-राष्ट्रिय मानकों के अनुसार मेनेजमेंट सिस्टम्स लगाती हैं. नैना देवी मन्दिर के प्रबंधन बोर्ड और रेल मंत्रालय को यह सिस्टम्स अपने यहाँ लगाने आवश्यक थे,पर उन्होंने नहीं लगाए. इस सिस्टम्स में जितनी भी संभावित रिस्क हो सकती हैं उनका आंकलन किया जाता है और फ़िर उन्हें दूर करने के उपाय किए जाते हैं. इस मानक का नंबर है OHSAS 18001.
मैंने अपनी कई क्लाइंट कम्पनियों में यह सिस्टम्स लगाने की कंसल्टेंसी दी है. उसके बाद वहां कोई दुर्घटना नहीं हुई है. आज कल एक स्टील प्लांट में कार्य रत हूँ. मन्दिर दुर्घटना के लिए मुख्य तौर पर मन्दिर प्रवंधन और सुरक्षा एजेंसीज जिम्मेदार हैं. रेल दुर्घटना के लिए रेल मंत्रालय और रेल मंत्री जिम्मेदार हैं. यदि यह सिस्टम लगाया गया होता तो यात्रियों को इस की पूरी जानकारी दी गई होती और उन्हें किसी भी इमरजेंसी में कैसे और क्या करना है इस के लिए भी ट्रेनिंग दी गई होती.
मन्दिर प्रवंधन, सुरक्षा एजेंसीज और रेल मंत्रालय / रेल मंत्री ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की और इतने निर्दोष यात्रिओं की जान गई. अब इन्हें कोई सजा दे पायेगा इस में तो पूरा संदेह है. सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि सरकार और बाबुओं को तो अब भगवान् भी ठीक नहीं कर सकते.
मैंने अपनी कई क्लाइंट कम्पनियों में यह सिस्टम्स लगाने की कंसल्टेंसी दी है. उसके बाद वहां कोई दुर्घटना नहीं हुई है. आज कल एक स्टील प्लांट में कार्य रत हूँ. मन्दिर दुर्घटना के लिए मुख्य तौर पर मन्दिर प्रवंधन और सुरक्षा एजेंसीज जिम्मेदार हैं. रेल दुर्घटना के लिए रेल मंत्रालय और रेल मंत्री जिम्मेदार हैं. यदि यह सिस्टम लगाया गया होता तो यात्रियों को इस की पूरी जानकारी दी गई होती और उन्हें किसी भी इमरजेंसी में कैसे और क्या करना है इस के लिए भी ट्रेनिंग दी गई होती.
मन्दिर प्रवंधन, सुरक्षा एजेंसीज और रेल मंत्रालय / रेल मंत्री ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की और इतने निर्दोष यात्रिओं की जान गई. अब इन्हें कोई सजा दे पायेगा इस में तो पूरा संदेह है. सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि सरकार और बाबुओं को तो अब भगवान् भी ठीक नहीं कर सकते.
Monday, August 04, 2008
अमरीका पर मुकदमा चलाओ
एक ख़बर के अनुसार अमरीका की जासूसी एजेंसी सीआइए ने वर्ष १९६५ में हिमालय के नंदा देवी में एक परमाणु-चालित बगिंग यंत्र लगाया था, जिसका उद्देश्य चीन पर जासूसी करना था. यह यंत्र एक तूफान में अपनी जगह से हट गया और अब कोई नहीं जानता यह यंत्र कहाँ है. सीआइए ने जिस टीम को इस काम पर लगाया था, उसके एक सदस्य ने यह जानकारी दी है. इस सदस्य के अनुसार यह यंत्र किसी भी समय खुल सकता है और उस के बाद भयंकर तबाही मचा सकता है. इस यंत्र से निकले रेडियोएक्टिव पदार्थ गंगा के पानी में मिलकर उसे दूषित कर देंगे और हिमालय से समुद्र तक बहने वाली गंगा के पानी से तबाही मचा देंगे.
अगर यह ख़बर सही है तब भारत सरकार को तुंरत इस पर कार्यवाही करनी चाहिए. क्या अमरीका ने यंत्र लगाने के लिए भारत सरकार की मंजूरी ली थी? अब अगर यह हादसा हो गया तो उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? अमरीका से तुंरत जवाब तलब किया जाना चाहिए. अमरीका में इसके लिए जिम्मेदार विभाग और व्यक्तियों पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए.
अगर यह ख़बर सही है तब भारत सरकार को तुंरत इस पर कार्यवाही करनी चाहिए. क्या अमरीका ने यंत्र लगाने के लिए भारत सरकार की मंजूरी ली थी? अब अगर यह हादसा हो गया तो उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? अमरीका से तुंरत जवाब तलब किया जाना चाहिए. अमरीका में इसके लिए जिम्मेदार विभाग और व्यक्तियों पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए.
Wednesday, July 09, 2008
जय बजरंग बली, तोड़ दुश्मन की नली
जय बजरंग बली, तोड़ दुश्मन की नली
मेरे एक जानकार हैं. उनकी एक आदत है, वह अक्सर यह कहते हैं - 'जय बजरंग बली, तोड़ दुश्मन की नली'. वह जब भी ऐसा कहते हैं, मैं उन्हें टोकता हूँ पर उनकी यह आदत नहीं छूटती.
ईश्वर से अपने लिए कुछ भी मांगने में कोई बुराई नहीं है. पर किसी और का नुक्सान हो, इस के लिए ईश्वर से प्रार्थना करना कैसी अजीब बात है. हम किसी दूसरे का नुक्सान चाहते हैं और इस के लिए ईश्वर से कहते हैं की वह हमारा यह काम कर दे. मतलब यह हुआ कि हमने ईश्वर को ही अपने दुश्मन के नाम की सुपारी दे दी.
मैंने एक किताब में पढ़ा - "दूसरों को सुख पहुंचाना महान धर्म है". तुलसीदास जी ने कहा है - "पर हित सरिस धर्म नहीं भाई". ईश्वर पिता हैं, हम सब उनके पुत्र हैं, हम सब में ईश्वर का निवास है. हम अगर किसी का नुक्सान करते हैं, उन्हें दुःख पहुंचाते है, तो वास्तव में हम ईश्वर को दुःख पहुंचाते हैं. क्या कभी हमने सोचा है कि ईश्वर को दुःख पहुँचा कर हम कितना महान पाप कर रहे हैं?
हमारा जीवन सुखी हो इसका एक उपाय है कि हम अपने स्वार्थ की बात उठते ही उसे काटें, और दूसरों के हित की बात उठे तो उसका पोषण करें. दूसरे का हित ही वास्तव में हमारा धन है. एक यही धन हमारे साथ जायेगा. इसे जितना कमा सकेँ कमायें.
मेरे एक जानकार हैं. उनकी एक आदत है, वह अक्सर यह कहते हैं - 'जय बजरंग बली, तोड़ दुश्मन की नली'. वह जब भी ऐसा कहते हैं, मैं उन्हें टोकता हूँ पर उनकी यह आदत नहीं छूटती.
ईश्वर से अपने लिए कुछ भी मांगने में कोई बुराई नहीं है. पर किसी और का नुक्सान हो, इस के लिए ईश्वर से प्रार्थना करना कैसी अजीब बात है. हम किसी दूसरे का नुक्सान चाहते हैं और इस के लिए ईश्वर से कहते हैं की वह हमारा यह काम कर दे. मतलब यह हुआ कि हमने ईश्वर को ही अपने दुश्मन के नाम की सुपारी दे दी.
मैंने एक किताब में पढ़ा - "दूसरों को सुख पहुंचाना महान धर्म है". तुलसीदास जी ने कहा है - "पर हित सरिस धर्म नहीं भाई". ईश्वर पिता हैं, हम सब उनके पुत्र हैं, हम सब में ईश्वर का निवास है. हम अगर किसी का नुक्सान करते हैं, उन्हें दुःख पहुंचाते है, तो वास्तव में हम ईश्वर को दुःख पहुंचाते हैं. क्या कभी हमने सोचा है कि ईश्वर को दुःख पहुँचा कर हम कितना महान पाप कर रहे हैं?
हमारा जीवन सुखी हो इसका एक उपाय है कि हम अपने स्वार्थ की बात उठते ही उसे काटें, और दूसरों के हित की बात उठे तो उसका पोषण करें. दूसरे का हित ही वास्तव में हमारा धन है. एक यही धन हमारे साथ जायेगा. इसे जितना कमा सकेँ कमायें.
Labels:
better life,
do not harm others,
help others,
sukhi jiwan
Tuesday, July 01, 2008
सुखी जीवन के मन्त्र - ४
योजना बद्ध तरीके से काम करें
हम सब काम करते हैं. किसी काम में हमें सफलता मिलती है और किसी में नहीं. सफलता मिलती है तो हम खुश होते हैं और हमें अपना जीवन सुखी लगता है. सफलता न मिलने पर हम दुखी हो जाते है और ऐसा लगता है कि हमारे जीवन में सुख नहीं है. इस असफलता के लिए हम अक्सर दूसरों को दोष देते है और उन्हें भी दुखी कर देते हैं. आपसी वैमनस्य भी बढ़ता है और हमारे जीवन में सुख और कम हो जाता है.
अगर हम योजना बद्ध तरीके से काम करें तो सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है, या यह कहें कि असफलता की सम्भावना कम हो जाती है. आज कल ज्यादातर कम्पनियां, उत्पाद और सेवा दोनों छेत्रों में, योजना बद्ध तरीके से काम करती हैं. इसके लिए वह अंतर्राष्ट्रीय मानकों को आधार बना कर अपनी योजनायें बनाती हैं, काम करने के तरीके निर्धारित करती हैं, उन पर अपने कर्मचारियों को ट्रेनिंग देती हैं, समय-समय पर कार्य की समीक्षा करती हैं, जो जरूरी सुधार करने हैं वह करती हैं. यह तरीके हम अपने निजी जीवन में भी अपना सकते हैं और अपने जीवन को सुखी कर सकते हैं.
मेरा सारा जीवन मेनेजमेंट सिस्टम्स पर काम करते बीत गया. आज भी में इन सिस्टम्स पर कम्पनिओं को कंसल्टेंसी देता हूँ. अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर में यह कह सकता हूँ कि योजना बद्ध तरीके से काम करने में शत-प्रतिशत सफलता मिलती है.
योजना बद्ध तरीके से काम कीजिए और अपने जीवन को सुखी बनाइये.
हम सब काम करते हैं. किसी काम में हमें सफलता मिलती है और किसी में नहीं. सफलता मिलती है तो हम खुश होते हैं और हमें अपना जीवन सुखी लगता है. सफलता न मिलने पर हम दुखी हो जाते है और ऐसा लगता है कि हमारे जीवन में सुख नहीं है. इस असफलता के लिए हम अक्सर दूसरों को दोष देते है और उन्हें भी दुखी कर देते हैं. आपसी वैमनस्य भी बढ़ता है और हमारे जीवन में सुख और कम हो जाता है.
अगर हम योजना बद्ध तरीके से काम करें तो सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है, या यह कहें कि असफलता की सम्भावना कम हो जाती है. आज कल ज्यादातर कम्पनियां, उत्पाद और सेवा दोनों छेत्रों में, योजना बद्ध तरीके से काम करती हैं. इसके लिए वह अंतर्राष्ट्रीय मानकों को आधार बना कर अपनी योजनायें बनाती हैं, काम करने के तरीके निर्धारित करती हैं, उन पर अपने कर्मचारियों को ट्रेनिंग देती हैं, समय-समय पर कार्य की समीक्षा करती हैं, जो जरूरी सुधार करने हैं वह करती हैं. यह तरीके हम अपने निजी जीवन में भी अपना सकते हैं और अपने जीवन को सुखी कर सकते हैं.
मेरा सारा जीवन मेनेजमेंट सिस्टम्स पर काम करते बीत गया. आज भी में इन सिस्टम्स पर कम्पनिओं को कंसल्टेंसी देता हूँ. अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर में यह कह सकता हूँ कि योजना बद्ध तरीके से काम करने में शत-प्रतिशत सफलता मिलती है.
योजना बद्ध तरीके से काम कीजिए और अपने जीवन को सुखी बनाइये.
Monday, June 09, 2008
'क' का कमाल - भाग १
आप 'सो कर उठने' से 'सो जाने तक' कोई न कोई काम करते रहते हैं. कुछ काम आप अपनी मर्जी से करते हैं और कुछ काम दूसरों के कहने पर. दफ्तर में बास आप को काम करने के लिए कहता है. आप का दिन कैसा गुजरा यह इस बात पर निर्भर करता है कि कितने कामों में आप को सफलता मिली.
मैं आज आप को एक मन्त्र देता हूँ, इस मंत्र के प्रयोग से आप के कामों के सफल होने की संभावना अधिकतम हो जायेगी. यह मंत्र है - 'क' का कमाल.
जब भी आप कोई काम करें, यह चार सवाल पूछिये -
क्या करना है?
क्यों करना है?
कैसे करना है?
कब तक करना है?
'क्या' से आप को काम के बारे में पूरी जानकारी मिलेगी. अक्सर यह देखा गया है कि लोग पूरी जानकारी लिए बिना काम शुरू कर देते है और बाद में परेशान हो जाते हैं. न तो काम समय से पूरा हो पाता है और न ही जिनके लिए काम कर रहे हैं वह पूरी तरह संतुष्ट हो पाते है. यदि आप नौकरी करते हैं तो आप का बास आप से नाराज हो जाता है. अगर आप बिजनेस करते हैं तो आप के ग्राहक आप से नाराज हो जाते हैं. दोनों ही मामलों में आप को हानि उठानी पड़ती है. इसलिए क्या करना है यह बात अच्छी तरह समझ लीजिये. काम करने के लिए जो भी जानकारी चाहिए वह ले लीजिये.
उसके बाद यह जानना जरूरी है कि यह काम आप 'क्यों' कर रहे है? अगर आप को काम की अहमियत का पता है तब आप उस में लापरवाही नहीं करेंगे. अक्सर यह देखा गया है कि लोग अपने काम में लापरवाही बरत जाते हैं और जब उनसे पूछा जाता है कि यह काम समय से क्यों नहीं हुआ, या काम में गलती क्यों हुई तब उन का जवाब होता है मुझे पता नहीं था कि यह काम इतना महत्वपूर्ण था.
अब आता है 'कैसे' करना है? अगर आपको काम कैसे करना है यह ही पता नहीं है तब आप काम कैसे करेंगे? इसलिए जब भी आप कोई काम करें या आप को कोई काम करने को कहा जाए तब यह अवश्य जान लें कि काम को करना कैसे है. काम की अहमियत को देखते हुए आप के पास आवश्यक अनुभव और दक्षता होनी चाहिए. इन के अभाव में आप काम ठीक से नहीं कर पायेंगे और परिणाम हानिकारक होगा.
आखिरी सवाल है, कब तक करना है? यह बहुत जरूरी है. लगभग हर काम के लिए एक समय सीमा निश्चित होती है. अगर काम समय तक नहीं लिया गया तो उसकी उपयोगिता ही कम या पूरी तरह समाप्त हो जाती है. इसका परिणाम भी हानिकारक ही होता है.
मेरा यह ब्यक्तिगत अनुभव है कि यह चार सवाल आप को अपने कामों में सफलता मिलने में पूरी सहायता करेंगे. सोचिये और पूछिये, फ़िर देखिये क्या होता है.
आगे के भागों में मैं हर सवाल पर विस्तृत चर्चा करूंगा. अपनी टिपण्णी देना न भूलियेगा.
मैं आज आप को एक मन्त्र देता हूँ, इस मंत्र के प्रयोग से आप के कामों के सफल होने की संभावना अधिकतम हो जायेगी. यह मंत्र है - 'क' का कमाल.
जब भी आप कोई काम करें, यह चार सवाल पूछिये -
क्या करना है?
क्यों करना है?
कैसे करना है?
कब तक करना है?
'क्या' से आप को काम के बारे में पूरी जानकारी मिलेगी. अक्सर यह देखा गया है कि लोग पूरी जानकारी लिए बिना काम शुरू कर देते है और बाद में परेशान हो जाते हैं. न तो काम समय से पूरा हो पाता है और न ही जिनके लिए काम कर रहे हैं वह पूरी तरह संतुष्ट हो पाते है. यदि आप नौकरी करते हैं तो आप का बास आप से नाराज हो जाता है. अगर आप बिजनेस करते हैं तो आप के ग्राहक आप से नाराज हो जाते हैं. दोनों ही मामलों में आप को हानि उठानी पड़ती है. इसलिए क्या करना है यह बात अच्छी तरह समझ लीजिये. काम करने के लिए जो भी जानकारी चाहिए वह ले लीजिये.
उसके बाद यह जानना जरूरी है कि यह काम आप 'क्यों' कर रहे है? अगर आप को काम की अहमियत का पता है तब आप उस में लापरवाही नहीं करेंगे. अक्सर यह देखा गया है कि लोग अपने काम में लापरवाही बरत जाते हैं और जब उनसे पूछा जाता है कि यह काम समय से क्यों नहीं हुआ, या काम में गलती क्यों हुई तब उन का जवाब होता है मुझे पता नहीं था कि यह काम इतना महत्वपूर्ण था.
अब आता है 'कैसे' करना है? अगर आपको काम कैसे करना है यह ही पता नहीं है तब आप काम कैसे करेंगे? इसलिए जब भी आप कोई काम करें या आप को कोई काम करने को कहा जाए तब यह अवश्य जान लें कि काम को करना कैसे है. काम की अहमियत को देखते हुए आप के पास आवश्यक अनुभव और दक्षता होनी चाहिए. इन के अभाव में आप काम ठीक से नहीं कर पायेंगे और परिणाम हानिकारक होगा.
आखिरी सवाल है, कब तक करना है? यह बहुत जरूरी है. लगभग हर काम के लिए एक समय सीमा निश्चित होती है. अगर काम समय तक नहीं लिया गया तो उसकी उपयोगिता ही कम या पूरी तरह समाप्त हो जाती है. इसका परिणाम भी हानिकारक ही होता है.
मेरा यह ब्यक्तिगत अनुभव है कि यह चार सवाल आप को अपने कामों में सफलता मिलने में पूरी सहायता करेंगे. सोचिये और पूछिये, फ़िर देखिये क्या होता है.
आगे के भागों में मैं हर सवाल पर विस्तृत चर्चा करूंगा. अपनी टिपण्णी देना न भूलियेगा.
Saturday, June 07, 2008
सुखी जीवन के मन्त्र - ३
"भावना मिट जाए मन से द्वेष अत्याचार की"
द्वेष मानव का सब से बड़ा शत्रु है. द्वेष हमारे जीवन से सारी खुशी छीन लेता है. दूसरों के सुख से हम दुखी होते हैं. दूसरों को दुखी देख कर ही हम खुश हो पाते हैं. अपना सुख तो हमारे पास रहता नहीं. कुछ व्यक्तियों को तो द्वेष इस हद तक प्रभावित करता है कि वह दूसरों को दुःख पहुँचने के लिए स्वयं को ही दुःख पहुँचने से नहीं हिचकिचाते.
द्वेष से प्रभावित व्यक्ति में अत्याचार की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है. दूसरों से उन का सुख छीनना ही उस के जीवन का उद्देश्य बन जाता है. वह हर समय इसी जोड़-तोड़ में लगा रहता है कि कैसे दूसरों का सुख छीना जाए या दूसरों को दुःख पहुँचाया जाए. धीरे-धीरे ऐसे व्यक्ति का सोच इतना बिगड़ जाता है कि वह दूसरों कि हत्या तक कर देता है.
अगर हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में सुख बना रहे और उस में लगातार वृद्धि होती रहे तब हमें द्वेष को अपने जीवन में आने से रोकना होगा. हम सुख पाना चाहते हैं तब दूसरों को सुख देना होगा. हम जैसा बोएँगे वैसा ही काटेंगे. यह ईश्वर का नियम है.
द्वेष मानव का सब से बड़ा शत्रु है. द्वेष हमारे जीवन से सारी खुशी छीन लेता है. दूसरों के सुख से हम दुखी होते हैं. दूसरों को दुखी देख कर ही हम खुश हो पाते हैं. अपना सुख तो हमारे पास रहता नहीं. कुछ व्यक्तियों को तो द्वेष इस हद तक प्रभावित करता है कि वह दूसरों को दुःख पहुँचने के लिए स्वयं को ही दुःख पहुँचने से नहीं हिचकिचाते.
द्वेष से प्रभावित व्यक्ति में अत्याचार की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है. दूसरों से उन का सुख छीनना ही उस के जीवन का उद्देश्य बन जाता है. वह हर समय इसी जोड़-तोड़ में लगा रहता है कि कैसे दूसरों का सुख छीना जाए या दूसरों को दुःख पहुँचाया जाए. धीरे-धीरे ऐसे व्यक्ति का सोच इतना बिगड़ जाता है कि वह दूसरों कि हत्या तक कर देता है.
अगर हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में सुख बना रहे और उस में लगातार वृद्धि होती रहे तब हमें द्वेष को अपने जीवन में आने से रोकना होगा. हम सुख पाना चाहते हैं तब दूसरों को सुख देना होगा. हम जैसा बोएँगे वैसा ही काटेंगे. यह ईश्वर का नियम है.
Sunday, December 31, 2006
सुखी जीवन के मन्त्र - २
"वायु, जल सर्वत्र हों शुभ गंध को धारण किए"
शुद्ध वायु और जल, सुखी जीवन के लिए जरूरी हैं. वायु और जल में किसी प्रकार की अशुद्धता हमारे जीवन को दुःख से भर देती है. आज उन्नत तकनीकों का प्रयोग करके भी पूर्ण रूप से शुदध वायु या जल हमें उपलब्ध नहीं हो पाता. इस के लिए हम स्वयं ही दोषी हैं. प्रकृति ने हमें शुद्ध वायु और जल प्रदान किया, पर हमने अपने अंहकार में उसे दूषित कर दिया. हमारे दैनिक जीवन का हर कार्य वायु और जल को दूषित करता है. इस जीव जगत में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो पर्यावरण को दूषित करता है. दूषित पर्यावरण आज मानव जाति के लिए सब से बड़ा खतरा बन गया है.
जब भी हम हवन करते हैं, उपरोक्त प्रार्थना करते हैं. हमारा जीवन सुखी हो और उस के लिए हम जिन बस्तुओं की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं, उन में शुदध वायु और जल भी शामिल हैं. पर हमारी यह प्रार्थना बस हवन का एक अंग बन कर रह गई है. हमारे दैनिक जीवन में इस का कहीं कोई प्रभाव नजर नहीं आता. हमारे ऋषि-मुनिओं ने स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण के महत्त्व को समझा. उन्होंने इस को प्रार्थनाओं में शामिल किया जिस से हमें यह याद रहे और हम ऐसे कार्यों से बचें जो पर्यावरण को दूषित करते हैं. पर हम इस सब की कोई परवाह नहीं करते और रोज नए तरीके ईजाद करते हैं पर्यावरण को दूषित करने के लिए. हम उसी डाल को काट रहे हैं जिस पर हम बैठे हैं.
अगर हम चाहते हैं कि हमारा जीवन सुखी हो तब हमें अपनी इस प्रार्थना को अपने जीवन में उतारना होगा.
शुद्ध वायु और जल, सुखी जीवन के लिए जरूरी हैं. वायु और जल में किसी प्रकार की अशुद्धता हमारे जीवन को दुःख से भर देती है. आज उन्नत तकनीकों का प्रयोग करके भी पूर्ण रूप से शुदध वायु या जल हमें उपलब्ध नहीं हो पाता. इस के लिए हम स्वयं ही दोषी हैं. प्रकृति ने हमें शुद्ध वायु और जल प्रदान किया, पर हमने अपने अंहकार में उसे दूषित कर दिया. हमारे दैनिक जीवन का हर कार्य वायु और जल को दूषित करता है. इस जीव जगत में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो पर्यावरण को दूषित करता है. दूषित पर्यावरण आज मानव जाति के लिए सब से बड़ा खतरा बन गया है.
जब भी हम हवन करते हैं, उपरोक्त प्रार्थना करते हैं. हमारा जीवन सुखी हो और उस के लिए हम जिन बस्तुओं की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं, उन में शुदध वायु और जल भी शामिल हैं. पर हमारी यह प्रार्थना बस हवन का एक अंग बन कर रह गई है. हमारे दैनिक जीवन में इस का कहीं कोई प्रभाव नजर नहीं आता. हमारे ऋषि-मुनिओं ने स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण के महत्त्व को समझा. उन्होंने इस को प्रार्थनाओं में शामिल किया जिस से हमें यह याद रहे और हम ऐसे कार्यों से बचें जो पर्यावरण को दूषित करते हैं. पर हम इस सब की कोई परवाह नहीं करते और रोज नए तरीके ईजाद करते हैं पर्यावरण को दूषित करने के लिए. हम उसी डाल को काट रहे हैं जिस पर हम बैठे हैं.
अगर हम चाहते हैं कि हमारा जीवन सुखी हो तब हमें अपनी इस प्रार्थना को अपने जीवन में उतारना होगा.
Friday, December 15, 2006
सुखी जीवन के मन्त्र - १
"स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो"
यह पंक्ति आर्य समाज हवन के बाद यज्ञ देव की आरती मैं से ली गई है. आज के समाज मैं जहाँ निजी स्वार्थ ने प्रेम का गला घोंट दिया है, यह पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण हो गई है. मनुष्य स्वभाव से थोड़ा बहुत स्वार्थी होता है. पर उसे निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए दूसरों का नुकसान नहीं करना चाहिए. निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए लोग कुछ भी ग़लत काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं. स्वार्थ पूरा न होने पर उनके मन मैं विरोधावास पैदा होता है. वह दूसरों को उस के लिए जिम्मेदार ठहराने लगते हैं. मन में बढ़ती नफरत हिंसा को जन्म देती है. आज भारतीय समाज इस हिंसा से टूट रहा है. भाई भाई का, बेटा बाप का, पड़ोसी पड़ोसी का, मित्र मित्र का, पति पत्नी का शत्रु बन गए हैं.
स्वार्थ अपने आप में बुरा नहीं हटा. स्वार्थ वही बुरा होता है जिससे किसी दूसरे का बुरा होता हो. अपना स्वार्थ पूरा हो जाने पर यदि मनुष्य उस का लाभ दूसरों को भी मिल जाने देता है तब वह स्वार्थ एक पुन्य बन जाता है. उदाहरण के तौर पर हम राजा भागीरथ का नाम ले सकते हैं. राजा भागीरथ ने गंगा जी को प्रथ्वी पर लाने के लिए कठिन तपस्या की. इसमें उनका अपना निजी स्वार्थ था - उन के पूर्वजों की मुक्ति. जब उन की स्वार्थसिद्धि हो गई और गंगा जी वापस स्वर्ग को जाने लगीं तब उन्होंने राजा से कहा - राजन मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ. जो चाहो वर मांग लो. राजा भागीरथ ने कहा - माँ आपने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की. ऐसी ही कृपा आप सब प्राणियों पर करती रहो. माँ ने कहा इस के लिए तो मुझे प्रथ्वी पर ही रुकना होगा. आज भी गंगा जी प्रथ्वी पर निवास करती हैं और करोड़ों लोगों पर कृपा करती हैं. आज भी राजा भागीरथ इस महान कार्य के लिय याद किए जाते हैं. कोई उनकी निजी स्वार्थसिद्धि की बात नहीं करता.
इस पंक्ति में हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं की वह हमारे निजी और संकुचित स्वार्थ भाव को मिटाकर उसे दूसरों के लिए कल्याणकारी बनाएं। जब हम दूसरों के कल्याण के लिए सोचेंगे या कार्य करेंगे तब हमारा प्रेम और गहरा और विस्तृत होता जाएगा. समाज मैं सब प्रेम से मिल कर रहेंगे. हिंसा समाप्त हो जायेगी. स्वर्ग प्रथ्वी पर उतर आएगा. आइये प्रभु से प्रार्थना करें - 'स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो', और अपने जीवन को सुखी बनायें।
Labels:
do not be greedy,
love all,
tips for better life
Subscribe to:
Posts (Atom)
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं
PROTECT RIGHT TO INFORMATION
Visit and sign on-line petition
Visit Website Promotion
For free advice on management systems - ISO 9001, ISO 14001, OHSAS 18001, ISO 22000, SA 8000 etc.
Contact S. C. Gupta at 9810073862
e-mail to qmsservices@gmail.com
Contact S. C. Gupta at 9810073862
e-mail to qmsservices@gmail.com
Visit http://qmsservices.blogspot.com
सुखी जीवन का रहस्य
दूसरों के सुख में सुखी होंगे तो आपका अपना जीवन सुखी होगा